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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
अकरोद्वन्धमोक्षांश्च वध्यानां मोक्षणं तथा |  १५   क
न च धर्मात्मजो राजा कदाचित्किञ्चिदव्रवीत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति