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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
सदा हि गत्वा ते वीराः पर्युपासन्त तं नृपम् |  ७   क
पादाभिवन्दनं कृत्वा धर्मराजमते स्थिताः |  ७   ख
ते मूर्ध्नि समुपाघ्राताः सर्वकार्याणि चक्रिरे ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति