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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तिभोजसुता चैव गान्धारीमन्ववर्तत |  ८   क
द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चान्याः पाण्डवस्त्रिय़ः |  ८   ख
समां वृत्तिमवर्तन्त तय़ोः श्वश्र्वोर्यथाविधि ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति