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मौसल पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
आदित्यो रजसा राजन्समवच्छन्नमण्डलः |  ४   क
विरश्मिरुदय़े नित्यं कवन्धैः समदृश्यत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति