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महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
ते श्रुत्वैव वचस्तस्य पौरजानपदा जनाः |  १५   क
भृशमुद्विग्नमनसो नाभ्यनन्दन्त तद्वचः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति