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महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽनुमान्य धर्मात्मा पौरजानपदं जनम् |  १७   क
गमनाय़ मतिं चक्रे भ्रातरश्चास्य ते तदा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति