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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
आतुरस्य कुतो निद्रा नरस्यामर्षितस्य च |  २१   क
अर्थांश्चिन्तय़तश्चापि कामय़ानस्य वा पुनः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति