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सभा पर्व
अध्याय १
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अर्जुन उवाच
प्राणकृच्छ्राद्विमुक्तं त्वमात्मानं मन्यसे मय़ा |  ६   क
एवं गते न शक्ष्यामि किञ्चित्कारय़ितुं त्वय़ा ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति