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द्रोण पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
शलस्य तु महाराज राजतो द्विरदो महान् |  २४   क
केतुः काञ्चनचित्राङ्गैर्मय़ूरैरुपशोभितः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति