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वन पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
तथानुमन्त्रितास्तेन धर्मराजेन ताः प्रजाः |  ३७   क
चक्रुरार्तस्वरं घोरं हा राजन्निति दुःखिताः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति