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वन पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
गुणान्पार्थस्य संस्मृत्य दुःखार्ताः परमातुराः |  ३८   क
अकामाः संन्यवर्तन्त समागम्याथ पाण्डवान् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति