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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
यक्षिण्या नैत्यकं तत्र प्राश्नीत पुरुषः शुचिः |  ९०   क
यक्षिण्यास्तु प्रसादेन मुच्यते भ्रूणहत्यया ||  ९०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति