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आदि पर्व
अध्याय ५
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सूत उवाच
तं प्रविश्याश्रमं दृष्ट्वा भृगोर्भार्यामनिन्दिताम् |  १४   क
हृच्छय़ेन समाविष्टो विचेताः समपद्यत ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति