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उद्योग पर्व
अध्याय १
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कृष्ण उवाच
दुर्योधनस्यापि मतं यथाव; न्न ज्ञाय़ते किं नु करिष्यतीति |  २३   क
अज्ञाय़माने च मते परस्य; किं स्यात्समारभ्यतमं मतं वः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति