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उद्योग पर्व
अध्याय १
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कृष्ण उवाच
निशम्य वाक्यं तु जनार्दनस्य; धर्मार्थय़ुक्तं मधुरं समं च |  २५   क
समाददे वाक्यमथाग्रजोऽस्य; सम्पूज्य वाक्यं तदतीव राजन् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति