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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
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सिद्ध उवाच
कर्मक्षय़ाच्च ते सर्वे च्यवन्ते वै पुनः पुनः |  ३७   क
तत्रापि च विशेषोऽस्ति दिवि नीचोच्चमध्यमः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति