आश्वमेधिक पर्व  अध्याय १३

वासुदेव उवाच

व्रतं यज्ञान्निय़मान्ध्यानय़ोगा; न्कामेन यो नारभते विदित्वा |  १०   क
यद्यद्ध्ययं कामय़ते स धर्मो; न यो धर्मो निय़मस्तस्य मूलम् ||  १०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति