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वन पर्व
अध्याय १२६
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लोमश उवाच
तस्याप्रतिहतं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः |  ३३   क
रत्नानि चैव राजर्षिं स्वय़मेवोपतस्थिरे ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति