वन पर्व  अध्याय २८१

सावित्र्यु उवाच

न कामय़े भर्तृविनाकृता सुखं; न कामय़े भर्तृविनाकृता दिवम् |  ५२   क
न कामय़े भर्तृविनाकृता श्रिय़ं; न भर्तृहीना व्यवसामि जीवितुम् ||  ५२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति