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द्रोण पर्व
अध्याय १२४
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सञ्जय़ उवाच
अनादिनिधनं देवं लोककर्तारमव्ययम् |  १५   क
त्वां भक्ता ये हृषीकेश दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति