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द्रोण पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
निहते तु तदा भीष्मे राजन्सत्यपराक्रमे |  १४   क
तावकाः पाण्डवेय़ाश्च प्राध्याय़न्त पृथक्पृथक् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति