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द्रोण पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
विस्मिताश्च प्रहृष्टाश्च क्षत्रधर्मं निशाम्य ते |  १५   क
स्वधर्मं निन्दमानाश्च प्रणिपत्य महात्मने ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति