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द्रोण पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
क्रोधसंरक्तनय़नाः समवेक्ष्य परस्परम् |  १८   क
पुनर्युद्धाय़ निर्जग्मुः क्षत्रिय़ाः कालचोदिताः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति