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द्रोण पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
विपन्नसस्येव मही वाक्चैवासंस्कृता यथा |  २५   क
आसुरीव यथा सेना निगृहीते पुरा वलौ ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति