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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
स विधन्वा महाराज रथशक्तिं परामृशत् |  ४७   क
तामवासृजदाविध्य क्रुद्धः कर्णरथं प्रति ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति