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कर्ण पर्व
अध्याय १
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जनमेजय़ उवाच
आपगेय़ं हतं श्रुत्वा द्रोणं च समरे परैः |  १८   क
यो जगाम परामार्तिं वृद्धो राजाम्विकासुतः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति