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कर्ण पर्व
अध्याय १
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जनमेजय़ उवाच
तथा शान्तनवं वृद्धं व्रह्मन्वाह्लिकमेव च |  २२   क
द्रोणं च सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति