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कर्ण पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
गाङ्गेय़े निहते शूरे दिव्यास्त्रवति सञ्जय़ |  ३४   क
द्रोणे च परमेष्वासे भृशं मे व्यथितं मनः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति