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कर्ण पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
तं द्रोणं निहतं श्रुत्वा धृष्टद्युम्नेन संय़ुगे |  ३९   क
सत्यसन्धं महेष्वासं भृशं मे व्यथितं मनः ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति