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कर्ण पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सर्वं यथा वृत्तं तत्त्वं गावल्गणे रणे |  ४६   क
आचक्ष्व पाण्डवेय़ानां मामकानां च सर्वशः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति