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कर्ण पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
यस्मादभावी भावी वा भवेदर्थो नरं प्रति |  ४८   क
अप्राप्तौ तस्य वा प्राप्तौ न कश्चिद्व्यथते वुधः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति