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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो दुर्योधनो राजा हतवन्धू रणाजिरात् |  ११   क
अपसृत्य ह्रदं घोरं विवेश रिपुजाद्भय़ात् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति