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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः पूर्वाह्णसमय़े शिविरादेत्य सञ्जय़ः |  १४   क
प्रविवेश पुरीं दीनो दुःखशोकसमन्वितः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति