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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रविश्य च पुरं तूर्णं भुजावुच्छ्रित्य दुःखितः |  १५   क
वेपमानस्ततो राज्ञः प्रविवेश निवेशनम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति