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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वैव च पुरो राजञ्जनः सर्वः स सञ्जय़म् |  १८   क
प्ररुरोद भृशोद्विग्नो हा राजन्निति सस्वरम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति