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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा चासीनमनघं समन्तात्परिवारितम् |  २२   क
स्नुषाभिर्भरतश्रेष्ठ गान्धार्या विदुरेण च ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति