शल्य पर्व  अध्याय १

वैशम्पाय़न उवाच

दुर्योधनो हतो राजन्यथोक्तं पाण्डवेन च |  २८   क
भग्नसक्थो महाराज शेते पांसुषु रूषितः ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति