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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
निःसञ्ज्ञं पतितं भूमौ तदासीद्राजमण्डलम् |  ४०   क
प्रलापय़ुक्ता महती कथा न्यस्ता पटे यथा ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति