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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जय़ोऽप्यरुदत्तत्र दृष्ट्वा राजानमातुरम् |  ४६   क
तथा सर्वाः स्त्रिय़श्चैव गान्धारी च यशस्विनी ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति