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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्तु योषितः सर्वा गान्धारी च यशस्विनी |  ४८   क
तथेमे सुहृदः सर्वे भ्रश्यते मे मनो भृशम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति