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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
प्राञ्जलिर्निःश्वसन्तं च तं नरेन्द्रं मुहुर्मुहुः |  ५२   क
समाश्वासय़त क्षत्ता वचसा मधुरेण ह ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति