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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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कृप उवाच
ध्रुवस्तत्र जय़ः कर्ण यत्र युद्धविशारदौ |  ३३   क
देवगन्धर्वय़क्षाणां मनुष्योरगरक्षसाम् |  ३३   ख
दंशितानामपि रणे अजेय़ौ कृष्णपाण्डवौ ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति