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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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भीष्म उवाच
पुनरेव तु तं शक्रः प्रहसन्निदमव्रवीत् |  १   क
निःश्वसन्तं यथा नागं प्रव्याहाराय़ भारत ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति