सौप्तिक पर्व  अध्याय १०

वैशम्पाय़न उवाच

न हि प्रमादात्परमोऽस्ति कश्चि; द्वधो नराणामिह जीवलोके |  १९   क
प्रमत्तमर्था हि नरं समन्ता; त्त्यजन्त्यनर्थाश्च समाविशन्ति ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति