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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति |  २   क
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्वुधाः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति