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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
मत्स्ययोनिमनुप्राप्य मृतो जाय़ति मानुषः |  १०५   क
मानुषत्वमनुप्राप्य क्षीणाय़ुरुपपद्यते ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति