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सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
स तांस्तु दृष्ट्वा भृशमार्तरूपो; युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः |  ३०   क
उच्चैः प्रचुक्रोश च कौरवाग्र्यः; पपात चोर्व्यां सगणो विसञ्ज्ञः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति