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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
व्राह्मणो हि महत्क्षेत्रं लोके चरति पादवत् |  ५३   क
यत्तत्र वीजं वपति सा कृषिः पारलौकिकी ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति