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शान्ति पर्व
अध्याय २८
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अश्मो उवाच
नाय़मत्यन्तसंवासो लभ्यते जातु केनचित् |  ५१   क
अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति