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वन पर्व
अध्याय २३४
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्धानवधं चास्य चक्रे क्रुद्धोऽर्जुनस्तदा |  २४   क
शव्दवेध्यमुपाश्रित्य वहुरूपो धनञ्जय़ः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति